लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार
मेंकिसकी बनी है आलमे-ना-पायदार
मेंबुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से
गिलाक़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार
मेंकहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में
एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमा
कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में
उम्रें -दराज़ मांग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में
1 comment:
Zafar was indeed a brillian poet. But one wonders if he could become a poet had Mughal rule not declined by his time... And this is what a dynasty rule does. It makes a forgettable king out of a brilliant poet !!
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